Saturday, May 28, 2011

बिहार में बढ़ता कॉल सेंटर का प्रभाव



                                                                              ओमप्रकाश  बारहवीं पास है . पटना में रहते है और पत्राचार से बीए कर रहे है. ओमप्रकाश और इन जैसे सैकड़ों  युवा जो भारतीय सेना में भर्ती होकर एक अच्छे भविष्य के साथ देश सेवा  का भी जज्बा रखते है. लेकिन कई कोशिशों के बाद भी उनका यह दुर्भाग्य रहा कि वे सलेक्ट नहीं हो पाए. ओमप्रकाश के पिता ऑटो चलते है, जिससे पुरे परिवार का खर्चा चलता है. परिवार में दो बहनों के होने और उनकी शादी कि चिंता से मनो पुरे परिवार कि भविष्य कि योजनओं पर ग्रहण लगा दिया हों,
              संचार क्रांति और टेलिकॉम सेक्टर के चलन ने एक एसे समय में जब ओमप्रकाश के लिए सबसे पहला काम अपनी पारिवारिक आमदनी बढ़ाना था डूबता को तिनके का सहारा दिया. कुछ हजार रुपयों से एक नामी टेलिकॉम कम्पनी को सेवा देने वाले कॉल सेंटर को ज्वाइन करने वाले ओमप्रकाश आज बारह हजार रूपये महिना कमाते हैं. अपनी एक बहन की शादी करने के बाद तो मानो उनका पुराना आत्मविश्वास फिर से लौट आया हैं.
   आज पटना में कई बड़ी कम्पनिओं के कॉल सेंटर खुल गए हैं. टेलिकॉम सेक्टर की कम्पनी जैसे - एयरटेल, वोडाफोन, डोकोमो, युनिनोर की तरह ही तेलिब्रांड जैसी बड़ी रिटेल चैन के कॉल सेंटर भी आज पटना में काम कर रहे  हैं. निजी ही नहीं बिहार सरकार ने भी अपने  कई विभागों और  योजनओं में जैसे- मानव विकास विभाग और महादलित मिशन में आम लोगो को हेल्प लाइन  सेवा मुहैया करने के लिए कॉल सेंटर खोंले हैं. जिसे बिहार के युवा एक अच्छे विकल्प के तौर पर आपना सकते हैं. कालेजों में पढ़ने वाला युवा वर्ग आज पढाई के साथ ही कॉल सेंटर में काम कर आपनी पढ़ाई का खर्चा खुद ही उठाने के साथ-साथ अपने परिवार को भी मदद दे रहे हैं. एसे युवाओं  के लिए कॉल सेंटर कमाई के जरिये के साथ ही आधुनिक जीवन की पहचान बन गए हैं. निश्चित योग्यता के के साथ एक सामान्य से  इंटरव्यू  से कॉल सेंटर में नौकरी पाई जा सकती है. जिसमे १५ से १८ दिनों की ट्रेनिंग के बाद काम चालू हो जाता है. फोन पर अपने ग्राहकों की समस्या सुलझाना हो या किसी उत्पाद की बिक्री करना हो इन सभी कामो के लिए आज कॉल सेंटर भी युवओं की ओर देख रहे हैं. 
मेट्रो सिटी में चलने वाले कॉल सेंटर पटना के कॉल सेंटर की अपेक्षा अधिक सुविधा संपन्न होते हैं. वहाँ अधिक वेतन के साथ आने - जाने के लिए गाड़िया रात में महिलाओं  के के लिए सुरक्षा व्यवस्था ओर समय-समय पर प्रोत्साहन की व्यवस्था होती है. लेकिन तेजी से विकास करते बिहार में कॉल सेंटर का चलन आभी नया ही है. ओर इसके कई सालो में कई हज़ार करोड़ के हो जाने की सम्भावना हैं. फिक्की जैसे बड़े संगठन ने भारत में बीपीओ ओर कॉल सेंटर  सेक्टर की वार्षिक विकास दर ५० प्रतिशत से भी आधिक बताई  हैं. जो युवओं के साथ ही स्थानीय सरकार के लिए राजस्व का अच्छा स्त्रोत है. 
      बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशिल कुमार मोदी ने कॉल सेंटर के बड़ते प्रभाव ओर उसके फायदों को देखते हुए ही एक नामी कंपनी के कॉल सेंटर के उद्घाटन समाहरो में बिहारी युवओं को सलहा दी थी कि वेह आगे आकर बीपीओ ओर कॉल सेंटर से जुड़े जिनमें बीए और बी. कॉम जैसी परंपरागत डिग्रियों कि जरुरत नहीं होती हैं. इसी के चलते आज पटना के आधिकांश  युवा इसकी और आकर्षित हो रहे हैं और ओमप्रकाश कि तरह ही अपने सपनो को साकार करने में लगे हुए हैं.      

Friday, April 8, 2011

हजारे से हजारों और हजारों से अरबों

                                    
  मेरे एक मित्र जिनके पिता एक सरकारी कार्यालय में कर्मचारी हैं। आजकल अबतक की एक असुलझी हुई समस्या से परेशान है। उनकी समस्या कोई उनकी व्यक्तिगत समस्या ना होकर एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। उनकी समस्या का कारण आजकल समाचार पत्रों की सुर्खियों में आने वाला वरिष्ठ समाजसेवी श्री अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशनहै। वह कहते हैं, कि एक ओर तो मैं एक अच्छा भारतीय नागरिक बनना चाहता हूं जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र को प्रगति के पथ पर आगे बढाने में सहयोग कर सकें , लेकिन दूसरी ओर अन्ना हजारे का समर्थन कर वह अपने पैर पर खुद ही कुलहाड़ी नहीं मार सकता। बहुत पूछने पर उन्होंने बताया की मेरे पिता की मासिक आय इतनी कम है कि उससे मैं और मेरा परिवार पूरे महीने सिर्फ खाना ही खा सकते हैं। अगर पिता की ऊपरी कमाई बंद हो जाएं तो मेरी पढ़ाई से लेकर बहन की शादी तक खटाई में पड़ सकती है। तो इस हालात में, मैं उस भ्रष्टाचार का विरोघ कैसे कर सकता हूँ जिससे मेरा घर चलता हो।
 एक मित्र की समस्या पर गौर कर पाया की यह समस्या किसी एक परिवार की नहीं बल्कि समाज के उस तबके की है जिनकी आमदनी तो बहुत कम लेकिन उनकी आकांक्षा समाज के साथ कदम से कदम मिलाकर विकास की नई बुलंदियों को छूने की हैं। तो सवाल यह उठता है कि, अगर एक भ्रष्टाचार (व्यक्तिगत भ्रष्टाचार) से किसी का विकास संभव है या किसी का पारिवारिक भरण-पोषण चलता हैं तो इससे किसी को क्या परेशानी हो सकती है। वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी की भ्रष्टाचार के विरुध राष्ट्रव्यापी मुहिम को अवरोध करना कहा तक सही माना जाएगां।
      गले तक भ्रष्टाचार में डूबी सरकार और उसी से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल विधेयकलाने के लिए राष्ट्रव्यापी मुहिम चलाना, यह काम सिर्फ अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे निस्वार्थ, समाज-सुधार के लिए कृतसंकल्पित लोग ही कर सकते है। आज जंतर-मंतर पर हजारों लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़े है। हो सकता है कि सरकार जनलोकपाल विधेयकके लिए राजी हो जाएं और एक कानून हमारे सामने आए। लेकिन क्या केवल कानूनों की संख्या बढ़ाकर समाज सुधार की कल्पना की जा सकती है। जहां तक एक विकसित और सभ्य समाज का प्रश्न है तो उसके लिए आवश्यकता कानूनों के निर्माण की नहीं बल्कि एक ऐसे सामाजिक वातावरण की है, जहां सुधार आत्मा की आवाज सुनकर हो ना की कानूनों के डर से।
                                                                   
                                                                  - जय हिंद
    

Saturday, March 12, 2011

सारे जांह से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा





               एक भारतीय होने के नाते सुन कर अच्छा लगता है l  लेकिन ना जाने क्यों कभी कभी अपने भारतीय होने पर शर्म सी आ जाती है l और जब अपने आप को उस व्यवस्था के अंग के रूप में पता हू तो लगता है कि शायद मेरा और मेरे जेसो का ही दोष है जो हमारे सामने इस रूप में आ रहा है जिसे वुद्दीजिवीयो की भाषा में शिक्षित और क्रांतिकरी मध्यम  वर्ग  कहते है l
वास्तव में  ये वर्ग उन लोगो का वर्ग है जिनकी बाते और विचार पेट से शुरू होकर रोटी पर ख़त्म हो जाते है l अपने आप को क्रांति का पर्याय मानने वाला मध्यम वर्ग आज के इस भोतिक वादी जीवन का इतना आदि हो चुका है की वह केवल अपने लिए जीना और सोचना चाहता  हैl                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          
  यह देख कर हेरानी होती है कि  अपने आप को जन जन कि आवाज कहने वाला सूचना और संचार का वाहक वर्ग केवल कुछ पैसो के लिए अपना ईमान तक गिरवी रखने को तैयार खड़ा है l  अपनी गलतियों से सीखना और दुसरो के लिए सबक बनने कि बाते क्या सिर्फ बाते है ? क्या हमारे महान लोगो की शिक्षाए हमारे लिए कोई मायिने नहीं रखती और अगर नही रखती तो क्यों हम उन्हें  पूज कर उनका अपमान करते है l
क्या हम भूल गए की हमने उस धरती पर जन्म लिया l जहा अपने से पहले  अपनों की परवाह की जाती है, क्या हम अपने मूल्य और संस्कृति को भूल गये जो हमे सच्चा इंसान और एक ईमानदार भारतीय बनती है l
                                                                                   - "जय हिंद "

Thursday, February 10, 2011

तनाशाही का मिजाज और जनता का आगाज

    बड़ी मुद्दत के बाद आखिरकार मिस्रीयों की मुराद पूरी हो ही गई। मिस्र में मुबारक का तानाशाही शासन आमजन के विरोध और अंतरर्राष्ट्रीय दबाब के आगे टिक ना सका, और आखिर मुबारक को अपना बोरीयां बिस्तर बांधकर भागना पड़ा। पिछले 18 दिनों से काहिरा के तहरीर चौक पर इक्ठ्ठा हुए लाखों मिस्र वासियों की महनत सफल हो ही गई। उन्हें स्वतंत्रता मिल गई, स्वतंत्रता भी छोटी-मोटी नहीं बल्कि पिछले 30 सालों से चले आ रहे ऐसे तानाशाही शासक से जो जिसका कद विश्व कई राष्ट्रों से भी बड़ा था। बड़ी ही खुशी की बात है सिर्फ मिस्र की आम जनता के लिए ही नहीं बल्कि उन सभी के लिए जो ऐसे किसी भी प्रकार के तानाशाही शासन को खत्म करना चाहते है।
  हाल के दिनों में तानाशाही के मिजाज से जुड़ी तीन बड़ी घटनाएं देखने को मिली और तीनों में ही उसे मूंह की खानी पड़ी। पहली घटना हमारे पड़ोस यानी म्यांमार की जहां कई वर्षो के बाद लोकतंत्र की आवाज मानी जाने वाली महिला नेता आन सान सू ची को वहां के सैनिक शासन (जुंटा शासन) से रिहाई मिली। तो दूसरी और ट्यूनिशिया के शासक को जनता के विद्रोह के आगे घुटने टेकने पड़े। तीसरी घटना हाल की मिस्र से जुड़ी है जहां अभी-अभी राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक का तख्तापलट वहां की आम जनता ने कर दिया, इसमें सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि इसमें जनता का साथ खुद सेना ने दिया, भले ही अप्रत्यक्ष रूप से लेकिन शायद उसकी मदद के बिना ऐसा संभव न होता या यूं कहे कि अगर सेना मुबारक के साथ होती तो इस आंदोलन के दम टोड़ने में जरा भी वक्त न लगता। जो भी हो लेकिन ये आमजन की जीत ही मानी जानी चाहिए।
     मिस्र की घटनाक्रम पर पूरा विश्व नजर गड़ाए बैठा था पिछले 18 दिनों का संघर्ष भी मीडिया ने खूब भुनाया। लगभग हर वह व्यक्ति जो टीवी-रेडियो के माध्यम से मिस्र से परिचित हुआ उसकी जुबान पर एक ही शब्द था मुबारक को सत्ता छोड़ देनी चाहिए। लेकिन आखिर क्या सिर्फ मुबारक का सत्ता छोड़कर चले जाना आमजन की जीत है या इसका दूसरा भी कोई विकल्प हो सकता था। कुछ दिनों पहले जब मिस्र में मुबारक की तानाशाही के खिलाफ आवाजें तेजी से उठनी चालू हुई उसी समय मुबारक ने अपने मंत्रीमंडल को भंग कर एक नए मंत्रीमंडल का गठन किया कहने को तो यह कहा जा रहा है कि इस नए मंत्रीमंडल में अधिकांश वही पुराने चहरे ही थे। क्या यह सिर्फ दिखावा नहीं हो सकता कि मुबारक राष्ट्रपति का पद छोड़ अपनी सारी ताकत अपने ही साथी ओमार सुलेमान के सुर्पद कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता अपने पास ही रखे रहें।
    


Monday, January 17, 2011

आंध्रा का नृत्य हरियाणा की जमी और भारतीय युवा दिल

आज जाने की जिद ना करो.......छोड़ दो आंचल जामाना क्या कहेंगा- ना जाने इतने ही कितने तरह के गीतों के बीच भारतीय जनसंचार संस्थान के 125 से भी अधिक भावी पत्रकार छात्रों का सफर चल रहा था- अपनी मंजिल सूरजकुंड मेले की ओर। दिल्ली के सीमावर्ती और हरियाणा के प्रसिद्ध जिले फरिदाबाद में स्थित सूरज कुंड जहां आज का थीम था आंध्रप्रदेश जिसमें आंध्रा संस्कृति की झलक देखते बनती थी। वैसे तो हमारा देश भारत पूरे विश्व में अपनी संस्कृतिक विविधता के जिए जाना जाता है लेकिन ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है कि देश की राजधानी दिल्ली से आए एक अलग सांस्कृतिे परिवेश के लोग देश की सबसे सम्रद्ध संस्कृतियों में से एक हरियाण/जाट संस्कृति की जमीन पर प्राचीनतम संस्कृति आंध्रा/तेलगु के विविध संस्कृतिक रंगों को निहारते हुए अपना बहुमूल्य समय व्यतीत कर रहे हो।
      भारतीय जन संचार संस्थान जो खुद भी कम विविधता से भरा हुआ नहीं है। देश के लगभग हर राज्यों से आने वाले छात्रों ने मिलकर इसे लगभग एक लघु भारत बना दिया है। कोई राजस्थान से तो कोई बंगाल से। कोई बिहार से तो कोई झारखण्ड़ से। कोई अपना मध्य प्रदेश छोड़कर आया है तो किसी को वापस अपने उत्तराखण्ड जाकर कुछ कर दिखाना है। ऐसे ही अनेक रंगो के फूलों से बसता है देश का सबसे बड़ा और सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता प्रशिक्षण का संस्थान। 

कल सुबह 9 बजे आप सभी संस्थान से सूरज कुंड मेले के लिए रवाना होंगे। इस बात का ध्यान रखे की आप आईआईएमसी का प्रतिनिधित्व करते है इसलिए संस्थान की गरिमा और मर्यादा का पूरा ख्याल रखे पूरा आनंद उठाए और कुछ नया सीखे जो आपको अपने व्यक्तिगत् और व्यवासायिक जीवन में काम आ सके। कुछ इस तरह9 बजे संस्थान परिसर में एक नए अनुभव को पाने के लिए व्याकुल और सूरज कुंड जाने के लिए ललायित नजर आ रहा था। लगभग 9%30 मिनट पर संस्थान प्रबंधन की और से उपलब्ध कराई गई] तीन बसो में सवार होकर भावी पत्रकारों का जत्था निकल पड़ा अपने निर्धारित गंतव्य की ओर। गाते सोते लड़ते-झगड़ते प्यार से गले मिलते इन छात्रों में भले ही अनेकों असमानताएं हो लेकिन इनका अपनापन और एक ही मातृभुमी की संताने होने का जज्बा अपने आप में किसी मिशाल से कम नजर नहीं आता।
 के अनौपचारिक निर्देशों और सलाहों के साथ संस्थान का प्रत्येक छात्र निर्धारित समय पर सुबह
      दो घंटे के अपने इस शानदार सफर के बाद सूरजकुंड मेले पहुचकर  इनका उत्साह चार गुना बड़ गया हो अपने अपने मित्रों की टोलियों में निकल पड़े मेले को अपने अपने चश्मे से देखने। कोई सांस्कतिक कार्यक्रमों के मंच का आनंद उठा रहा था तो कोई हेंड़ी क्राफ्ट आइटम को देखने में लगा हुआ था किसी को पेट पूजा करनी थी तो कोई सबसे पहले पूरा मेला घूम लेना चाहता था। कुछ तो हाथो में कापी-कलम लिए अपने पत्रकारिय गुणों का उपयोग कर देशी विदेशी महमानों का साक्षत्कार करने में व्यस्त था तो कुछ मेले के प्रबंधन की जानकरियां जुटाने में लगे हुए थे।