Friday, April 8, 2011

हजारे से हजारों और हजारों से अरबों

                                    
  मेरे एक मित्र जिनके पिता एक सरकारी कार्यालय में कर्मचारी हैं। आजकल अबतक की एक असुलझी हुई समस्या से परेशान है। उनकी समस्या कोई उनकी व्यक्तिगत समस्या ना होकर एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। उनकी समस्या का कारण आजकल समाचार पत्रों की सुर्खियों में आने वाला वरिष्ठ समाजसेवी श्री अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशनहै। वह कहते हैं, कि एक ओर तो मैं एक अच्छा भारतीय नागरिक बनना चाहता हूं जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र को प्रगति के पथ पर आगे बढाने में सहयोग कर सकें , लेकिन दूसरी ओर अन्ना हजारे का समर्थन कर वह अपने पैर पर खुद ही कुलहाड़ी नहीं मार सकता। बहुत पूछने पर उन्होंने बताया की मेरे पिता की मासिक आय इतनी कम है कि उससे मैं और मेरा परिवार पूरे महीने सिर्फ खाना ही खा सकते हैं। अगर पिता की ऊपरी कमाई बंद हो जाएं तो मेरी पढ़ाई से लेकर बहन की शादी तक खटाई में पड़ सकती है। तो इस हालात में, मैं उस भ्रष्टाचार का विरोघ कैसे कर सकता हूँ जिससे मेरा घर चलता हो।
 एक मित्र की समस्या पर गौर कर पाया की यह समस्या किसी एक परिवार की नहीं बल्कि समाज के उस तबके की है जिनकी आमदनी तो बहुत कम लेकिन उनकी आकांक्षा समाज के साथ कदम से कदम मिलाकर विकास की नई बुलंदियों को छूने की हैं। तो सवाल यह उठता है कि, अगर एक भ्रष्टाचार (व्यक्तिगत भ्रष्टाचार) से किसी का विकास संभव है या किसी का पारिवारिक भरण-पोषण चलता हैं तो इससे किसी को क्या परेशानी हो सकती है। वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी की भ्रष्टाचार के विरुध राष्ट्रव्यापी मुहिम को अवरोध करना कहा तक सही माना जाएगां।
      गले तक भ्रष्टाचार में डूबी सरकार और उसी से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल विधेयकलाने के लिए राष्ट्रव्यापी मुहिम चलाना, यह काम सिर्फ अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे निस्वार्थ, समाज-सुधार के लिए कृतसंकल्पित लोग ही कर सकते है। आज जंतर-मंतर पर हजारों लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़े है। हो सकता है कि सरकार जनलोकपाल विधेयकके लिए राजी हो जाएं और एक कानून हमारे सामने आए। लेकिन क्या केवल कानूनों की संख्या बढ़ाकर समाज सुधार की कल्पना की जा सकती है। जहां तक एक विकसित और सभ्य समाज का प्रश्न है तो उसके लिए आवश्यकता कानूनों के निर्माण की नहीं बल्कि एक ऐसे सामाजिक वातावरण की है, जहां सुधार आत्मा की आवाज सुनकर हो ना की कानूनों के डर से।
                                                                   
                                                                  - जय हिंद
    

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