तनाशाही का मिजाज और जनता का आगाज
बड़ी मुद्दत के बाद आखिरकार मिस्रीयों की मुराद पूरी हो ही गई। मिस्र में मुबारक का तानाशाही शासन आमजन के विरोध और अंतरर्राष्ट्रीय दबाब के आगे टिक ना सका, और आखिर मुबारक को अपना बोरीयां बिस्तर बांधकर भागना पड़ा। पिछले 18 दिनों से काहिरा के तहरीर चौक पर इक्ठ्ठा हुए लाखों मिस्र वासियों की महनत सफल हो ही गई। उन्हें स्वतंत्रता मिल गई, स्वतंत्रता भी छोटी-मोटी नहीं बल्कि पिछले 30 सालों से चले आ रहे ऐसे तानाशाही शासक से जो जिसका कद विश्व कई राष्ट्रों से भी बड़ा था। बड़ी ही खुशी की बात है सिर्फ मिस्र की आम जनता के लिए ही नहीं बल्कि उन सभी के लिए जो ऐसे किसी भी प्रकार के तानाशाही शासन को खत्म करना चाहते है।
हाल के दिनों में तानाशाही के मिजाज से जुड़ी तीन बड़ी घटनाएं देखने को मिली और तीनों में ही उसे मूंह की खानी पड़ी। पहली घटना हमारे पड़ोस यानी म्यांमार की जहां कई वर्षो के बाद लोकतंत्र की आवाज मानी जाने वाली महिला नेता आन सान सू ची को वहां के सैनिक शासन (जुंटा शासन) से रिहाई मिली। तो दूसरी और ट्यूनिशिया के शासक को जनता के विद्रोह के आगे घुटने टेकने पड़े। तीसरी घटना हाल की मिस्र से जुड़ी है जहां अभी-अभी राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक का तख्तापलट वहां की आम जनता ने कर दिया, इसमें सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि इसमें जनता का साथ खुद सेना ने दिया, भले ही अप्रत्यक्ष रूप से लेकिन शायद उसकी मदद के बिना ऐसा संभव न होता या यूं कहे कि अगर सेना मुबारक के साथ होती तो इस आंदोलन के दम टोड़ने में जरा भी वक्त न लगता। जो भी हो लेकिन ये आमजन की जीत ही मानी जानी चाहिए।
मिस्र की घटनाक्रम पर पूरा विश्व नजर गड़ाए बैठा था पिछले 18 दिनों का संघर्ष भी मीडिया ने खूब भुनाया। लगभग हर वह व्यक्ति जो टीवी-रेडियो के माध्यम से मिस्र से परिचित हुआ उसकी जुबान पर एक ही शब्द था ‘मुबारक को सत्ता छोड़ देनी चाहिए‘। लेकिन आखिर क्या सिर्फ मुबारक का सत्ता छोड़कर चले जाना आमजन की जीत है या इसका दूसरा भी कोई विकल्प हो सकता था। कुछ दिनों पहले जब मिस्र में मुबारक की तानाशाही के खिलाफ आवाजें तेजी से उठनी चालू हुई उसी समय मुबारक ने अपने मंत्रीमंडल को भंग कर एक नए मंत्रीमंडल का गठन किया कहने को तो यह कहा जा रहा है कि इस नए मंत्रीमंडल में अधिकांश वही पुराने चहरे ही थे। क्या यह सिर्फ दिखावा नहीं हो सकता कि मुबारक राष्ट्रपति का पद छोड़ अपनी सारी ताकत अपने ही साथी ओमार सुलेमान के सुर्पद कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता अपने पास ही रखे रहें।
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