एक भारतीय होने के नाते सुन कर अच्छा लगता है l लेकिन ना जाने क्यों कभी कभी अपने भारतीय होने पर शर्म सी आ जाती है l और जब अपने आप को उस व्यवस्था के अंग के रूप में पता हू तो लगता है कि शायद मेरा और मेरे जेसो का ही दोष है जो हमारे सामने इस रूप में आ रहा है जिसे वुद्दीजिवीयो की भाषा में शिक्षित और क्रांतिकरी मध्यम वर्ग कहते है lवास्तव में ये वर्ग उन लोगो का वर्ग है जिनकी बाते और विचार पेट से शुरू होकर रोटी पर ख़त्म हो जाते है l अपने आप को क्रांति का पर्याय मानने वाला मध्यम वर्ग आज के इस भोतिक वादी जीवन का इतना आदि हो चुका है की वह केवल अपने लिए जीना और सोचना चाहता हैl
यह देख कर हेरानी होती है कि अपने आप को जन जन कि आवाज कहने वाला सूचना और संचार का वाहक वर्ग केवल कुछ पैसो के लिए अपना ईमान तक गिरवी रखने को तैयार खड़ा है l अपनी गलतियों से सीखना और दुसरो के लिए सबक बनने कि बाते क्या सिर्फ बाते है ? क्या हमारे महान लोगो की शिक्षाए हमारे लिए कोई मायिने नहीं रखती और अगर नही रखती तो क्यों हम उन्हें पूज कर उनका अपमान करते है l क्या हम भूल गए की हमने उस धरती पर जन्म लिया l जहा अपने से पहले अपनों की परवाह की जाती है, क्या हम अपने मूल्य और संस्कृति को भूल गये जो हमे सच्चा इंसान और एक ईमानदार भारतीय बनती है l
- "जय हिंद "
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