Monday, September 20, 2010

हिन्दुस्तान में हिन्दू आगे हिंदी पीछे

l हिंदु और हिंदी दोनों के रिश्ते हिन्दुस्तान से वैसे ही है, जैसे किसी माता के लिए पुत्र - पुत्री l लेकिन ना जाने क्यों भारतीय दूषित  परम्पराऔ  के  अनुसार हिन्दुत्व को तो पुत्र सा प्यार और दुलार मिलता है, वही हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है l
        
ताजा घटनाओं पर नजर डाले तो पता चलता हैकि अयोध्या भूमि विवाद  निर्णय  के इंतज़ार में लोक (जनता) और लोकतंत्र (जनता और सरकार)  दोनों ने कितनी सावधानी और संवेदनशीलता का परिचय दिया l वही दूसरी ओर  हिंदी पखवाड़े पर तो लोगो ने और ही सरकार ने किसी प्रकार की भावनाओ  का  प्रदर्शन  किया l माना जा सकता है की तात्कालिक परिवेश में साम्प्रदायिकता का मुद्दा भाषाई अस्मिता से बड़ा जरुर नजर आता हैलेकिन इसका  भी एक कारण कही कही भाषाई अस्मिता का कमजोर होना ही है भाषाई अस्मिता का कमजोर होना भी  साम्प्रदायिक आस्थिरता के लिए जिम्मेदार है l
           क्यों हम भारतीय अपने आप को हिंदु , मुस्लिम , सिख , ईसाई में बाटने में लगे हुए है l हिंदी हमारी भाषा ही नहीं बल्कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारी पहचान है l अगर इस मूल मंत्र को हम समझ पाए तो हम किसी विशेष पहचान से नही बल्कि अपनी भाषा "हिंदी" से जाने जाएगे l जो असल में हमारा  धर्म और  संस्कृति है l जब जाकर हम गर्व से कह सकेगे कि  "हिंदी है हम , वतन है हिन्दुस्तान हमारा " l     
   आज पूरी दुनिया में हिंदी भाषी लोग रह रहे है l भारतीय नेतृत्व, भारत को महाशक्ति  बनाने के लिए अन्य राष्टो का समर्थन हासिल करने का प्रयास कर रहा l बुद्धिजीवी वर्ग  भी अपने स्तर पर हिंदी को विश्व भाषा बनाने में लगा हुआ है, जो किसी महाशक्ति के लिए जरुरी भी हैइन सब बातो के होते हुए भी आम जन के पास हमारी अपनी भाषा को देने के लिए समय का आभाव है l साल के ३६५ दिनों में हमारे पास अपनी पहचान, अपनी भाषा को देने के लिए केवल १५ दिन है, जिसे हम  "हिंदी पखवाड़ेके रूप में मानते है l
                                    
इस साल अत्यधिक व्यस्तता (cwg) और हिंदी के प्रति उदासीनता ने फिर यह साबित कर दियाकि हिंदी संयुक्त राष्ट  में शामिल होकर विश्व  भाषा बनने  का दम तो रखती है l लेकिन उसकी हैसियत अपने ही देश में किसी नोकरानी से कम नही है l  ओर अधिक इत्तेफाक तब होता है जब  हिंदी उत्थान की बाते करने वाले सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान केवल एक बैनर लगा "हिंदी पखवाड़े" की  औपचारिकता पूरी करते नजर आता  है  l